The Hippocrates of Social Messaging

These days lots of positive message are posted and exchanged on Whatsapp and Facebook. People take lots of pain to write these messages and put in lots of creativity and ingenuity to draw beautiful backgrounds and pics. Many people upload motivating videos, audio clips as well, all and all, a very good happening.

Now let us consider our actions. As soon a message is received, we read it; if it motivates, we feel goody goody, we wanna share it immediately. Even if we do not feel goody-goody, we are going to forward it, often with a note, “forward it immediately”.

But there is a question, which keeps nagging my mind. Do we seriously read the positive messages; we keep on forwarding/ sharing? Do we take a serious note of the contents of the message? Do we ponder over it really seriously to check whether we also follow all or at least a few of the positive traits highlighted in the message? Do we? If we do this, it is laudable but I have reasonable doubts ! One does need some time to ponder over a message and to spare some time is a big big issue these days. Moreover at times, so many messages pass hands in a row that it is really very difficult to remember the contents!

Some people do not read a message fully, they just love to forward a message as soon it is received and at times to the person, who originally shared it!! Some messages are just too lengthy; by the time one reads last line, the thread of the message is already lost. Messages in hindi are replete with spelling mistakes!! Vast knowledge, of Geeta, Vedas, Upanishads and likes of it, is freely flowing on whatsapp and facebook “GANGA”. There is a flood of knowledge. A serious and enviable competition is going on; to take credit of spreading the knowledge first!! A note is attached to many messages, “New in the market…Forward immediately”.

This game of receiving/forwarding the messages is now becoming repelling. In fact it truly reflects our age old self-defeating approach towards community responsibilities and beliefs. We believe in preaching without practicing. In our society preachers, saints, social reformers are always kept in a very high esteem and ironically, on this count, conmen have always been taking advantage of sentiments of masses. Number of such people was always increasing, albeit slowly in the past, but with the advent of powerful social messaging platforms like Whatsapp and Facebook, population of such pseudo-reformers is on the rise, rather dramatically.

Just think for a while that a huge section of our population, majority of which are youngsters, are receiving reading and sharing umpteen number of motivating messages every day; still this very section is leading a life full of stress !! Why? There seems to be no remission in the ugly rat-race in our society & cut throat competition, we see all around. Whereas there should have been a change, especially when so many people, the youngsters, are reading and sharing all the good messages every day!! There should have been a positive reflection of all this on the society!! Don’t you think so? Or you just did not bother to take note of it? Probably you are also busy in this self defeating game of receiving/sharing of positive and motivating messages and taking credit of being a “Good Person”!!!

So what do we do?

Well we can do one thing at least!! We do not forward a massage as soon we receive and read it. We should brood over it, for some time at least, to check that do we have the positive traits, written in the message? Or are we practicing things we wanna others to follow? After all when we share a good message with our friends and others, we have an intention of advice for others!! Take note of it my dear; Follow it!!! Isn’t it so? So if we want others to follow a good trait, what about our self? Should not we need to give a considered thought about the contents of the message? Should not we check that do I follow these?

Well we may not do it every day, with each message but at least once in a while, once in a week, we may pick up one-two motivating messages to ponder over them. To check that, do we have those positive traits in us or do we already follow the positive thoughts reflected in message or we need to practice them too? I am pretty sure that even if we do it once in a week with just 1-2 messages and put into action the positive thoughts of the messages, soon a positive change will emerge, all around us. A change we need badly, as a nation of youngsters, more than that, what we needed in the past !!

I don’t see any problem in it. We are to pick up just one-two messages per week. Any motivating message, you like. Choose a message of your liking, at your convenience, but follow it. Try to inculcate positive approach of a motivating message in your thoughts, your behaviour. Just do it and see the effect. Soon our society and the nation will be filled with a new positivity and happiness. Give a try at least!!!!

सोशल मैसेजिंग की महिमा

आजकल व्हाट्सऐप और फेसबुक पर रोज़ न जाने कितने मैसेज पोस्ट और फॉरवर्ड किये जाते हैं. हम सभी करते हैं. कुछ लोग बड़ी ही मेहनत करते हैं, इनको बनाने में, लिखने में, खूबसूरत फोटो और बैकग्राउंड डालने में. कुछ लोग अपने या औरों के लिखे हुए खूबसूरत विचारों को भी लिख कर या ऑडियो  क्लिप के रूप में पोस्ट करते हैं. वाकई एक अच्छा काम हो रहा है. कुल मिलाकर एक पॉजिटिव शुरुआत!

अब आईये इसके दूसरे पहलू पर गौर करें. जैसे ही कोई मैसेज आता है, उसे पढ़ते हैं, अच्छा लगता है, गुडी गुडी फील करते हैं, तो तुरंत फॉरवर्ड कर देते हैं. वैसे कई बार गुडी गुडी फील न भी हो तो फॉरवर्ड तो करते ही हैं. अक्सर फॉरवर्ड करने के साथ ये भी जोड़ देते हैं, कि अच्छा लगे (न भी लगे तो भी क्या) आगे फॉरवर्ड ज़रूर करें. भई ये भी अच्छी बात है.

पर यहाँ एक प्रश्न उठ खड़ा होता है कि जो सन्देश हमने पढ़ा, फॉरवर्ड किया, उस पर विचार कितना किया? क्या ये सोचा की जो अच्छी बात इसमें कही गयी है, क्या वो बात हमारे आचरण में है? क्या हम ऐसा करते हैं? अगर ऐसा है तो वाकई बड़ी अच्छी बात है पर अच्छे, प्रेरक मैसेज पर विचार कुछ लोग ही करते होंगे ऐसा मेरा अनुमान है. किसी बात पर सोच-विचार करने में वक़्त लगता है, और इतना वक़्त हमारे पास कहाँ है? मैसेज के  बारे में सोचने में एक समस्या और है कि कई बार मैसेज इतनी तेज़ी से रिसीव और फॉरवर्ड किये जाते हैं कि 5 मिनट बाद ही ये याद नहीं रहता कि किस मैसेज में क्या था ?

अच्छा कुछ लोग मैसेज पढ़ते ही नहीं, बस फॉरवर्ड करते हैं, उनको भी, जिन्होंने भेजा था!! कई मैसेज इतने लंबे होते हैं कि आख़िरी लाइन तक पहुँचते पहुँचते मैसेज का सिरा ही गायब हो जाता है. हिंदी के अधिकाँश संदेशों में मात्राओं की इतनी गलतियां होती हैं कि क्या कहा जाये. गीता, उपनिषद् वेदों आदि का और विभिन्न संतों, समाज सुधारकों आदि का सारा ज्ञान आजकल व्हाट्सऐप और फेसबुक पर जबर्दस्त तरीके से बह रहा है. ज्ञान गंगा की बाढ़ आ गयी है. लोग क्रैडिट ले रहे हैं, होड़ मची हुयी है, कौन पहले फॉरवर्ड करता है. कई मैसेज में तो लिखा होता है, बाज़ार में नया है, जल्दी फॉरवर्ड करो.

ये सारा खेल अब अरुचिकर लगने लगा है. दरअसल जो भी हो रहा है वो हमारे सामाजिक ढाँचे के सदियों पुराने ‘आत्मघाती’ रवैये (Self-defeating approach) को ही दर्शा रहा है. हमारे समाज में उपदेशकों, समाज सुधारकों और संतों आदि को बड़ा सम्मान मिलता रहा है, तो इसके चलते ऊपर से तो संत पर वास्तव में “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” किस्म के लोगों की संख्या में इज़ाफा होता ही रहा है और फेसबुक और व्हाट्सऐप नें ऐसे लोगों की संख्या को आसमान पर पहुंचा दिया है.

जरा सोचिये, देश का बेहद बड़ा तबका, जिसमें नौज़वान सबसे ज्यादा हैं, वो दिन रात फेसबुक और व्हाट्सऐप पर प्रेरक, पौजीटिव मैसेज शेयर करे जा रहे हैं, पर फिर भी लोग तनाव से भरपूर जीवन क्यूँ जी रहे हैं? आज जितनी मारा-मारी, लालच, आपा-धापी, फ़रेब और गला काट प्रतिस्पर्धा हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसमें तो कोई कमी नहीं आ रही. क्यूँ ? जब अधिकाँश लोग रोज़ कोई न कोई प्रेरक मैसेज पढ़ रहे हैं, शेयर कर रहे हैं, तो फर्क पड़ना चाहिए न? क्या आपको ऐसा नहीं लगता? या आपने भी इस बात पर गौर नहीं किया? या किया तो सही, पर भूल गए, मैसेज रिसीव-शेयर करने की आपा-धापी में.

तो क्या करें?

कम से कम एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि मैसेज को पढ़ते ही फॉरवर्ड न करें  और करें भी तो कम से कम ये तो सोचें की जो पौजीटिव मैसेज हम लोगों को भेज रहे हैं उस पर हम तो अमल करें. किसी को मैसेज शेयर करने का क्या मतलब है? यही ना कि भई, अच्छी बात है, इसे फालो करो. पर ये भी तो सोचें, कि क्या मैं इसे फालो करता हूँ/करती हूँ? यदि नहीं करता हूँ/करती हूँ तो पहले खुद तो फालो करूँ, फिर इसे फॉरवर्ड करूँ? ऐसा हम चाहे रोज़ न करें, हफ्ते में सिर्फ एक दिन, सिर्फ एक दिन किन्हीं 1-2 मैसेज पर ही विचार करें, चिंतन-मनन करें और इन बातों को अपने व्यवहार में उतारने की कोशिश तो करें. अगर हम ऐसा करने लगें तो हमारी सोसाईटी में तेज़ी से पौजीटिव परिवर्तन आने लगेंगे, जिसकी, हमारी युवा पीढ़ी के साथ साथ, सारे देश को सख्त ज़रूरत है.

इसमें कोई बड़ी समस्या नहीं है. हम सबके पास हफ्ते में 20-25 पौजीटिव मैसेज तो आते ही हैं, बस 1-2 को चुनना और विचार करना है. कोई बंदिश नहीं. जो मैसेज आपको भाये, जो भी आप अपने व्यवहार में ला सकते हैं, आपकी सुविधानुसार, जो सूट करे. उसी पर अमल करना शुरू कर दें. आप सफल होंगे और हमारे चारों तरफ पाज़िटिविटी फ़ैलने लगेगी. हम सफल होंगे, हैपीनेस फ़ैलाने में. जरा विचार तो करें.

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