How can a father ruin the life of his child?

30 year old Sujoy was brought to us for counseling by his father. Both father and son were at loggerheads with each other. Carrying a physically weak and limp body, the son appeared dull and somewhat dumb to us but soon we could sense a sharp mind, a mind which was longing to live a joyous life, but hidden behind a shell.Counseling sessions revealed a very strained relationship between father & son and son & mother too (but to a lesser extent). The father was a self-made person who rose to success and local fame through hard work. Although very young himself, he became a bread winner for his joint family, soon after the untimely death of his father. In the passion of becoming a role model for his joint family, he forgot to notice the disabilities of his young son, who had some physical problems since birth. The son learned to walk late, learned to speak slowly but the busy father did not notice.

The Sujoy needed a different treatment than other senior siblings of the joint family but almost opposite happened. He was always compared with other normal children of the family who were doing well in all fields. Sujoy would be criticized, admonished and would even be beaten badly, when not showing up to the expectations of his father. Soon a rift was created in the young mind which deepened with time. Early in his childhood Sujoy created a shell around him. He became stubborn. He would say ‘No’to most of the things because after his each little failure he would hear same words, “he is worthless, he can’t do anything”…etc. Time passed by, Sujoy could graduate to MBA with honorable grades. He started assisting his father in the family business but here too,many times, he would be looked down upon by his father before their employees. It always hurt him badly.

Sujoy’s father failed to understand that, except the physical disability, his son was a sharp boy who could do wonders with the business and in his own life only if the father would shower respect and love on him. Sujoy wished his father could understand his weakness and strength both and wished him to become his support pillar. Father too, deep down in his heart, loved him much but strongly resisted to not to show this. He was not willing to give him free hand to let Sujoy show his worth, although at the core of his heart, he dreamt the same.

We told Sujoy’s father that Sujoy’s current personality is his creation. It was his failure to provide him emotional support, when he needed it most. Even now Sujoy’s father is unable to accept the truth, the reality and the consequences of his negligence. He often told us that, “every big person in this town knows me well” but in our opinion he miserably failed to become friend of his own son.

Sujoy is willing to come out of his shell of self-defense, the shell of defiance. He too wishes to regain his lost self-esteem. He has a sharp mind which has bold plans for the family business but he needs support, freedom and most importantly trust of his father. He is confident of achieving wonders.Once his father is with him, there will be no looking back. Once this happens, he will also overcome his physical disabilities (mostly muscular weakness), he confided in us.

But would it happen? Yes it would, only if his father admits his follies, leave aside his super-flamed ego and sea the reasons and logics of Sujoy and his counselors. He needs to start reposing faith and trust in Sujoy’s abilities, talents and potentials and starts supporting him emotionally to become Sujoy’s main support pillar.

Otherwise one more young and potential life would be wasted. One more family would live in guilt and despair. One more young man may end his life leaving a grieving father who would never understand that this all was his own creation.

Please look after your children well. See their abilities and disabilities. Do not compare with others. Do not impose your aspirations and your failures on them. Do not force them to follow or accomplish your failed projects. Each child is a unique creation. Understand his/her abilities, strengths/weaknesses and provide support, love and knowledge to make them self-confident persons in life. Rest leave on their efforts and destiny. The result would only be one, A Happy Person.

कैसे कोई पिता अपने बच्चे की ज़िन्दगी बर्बाद कर सकता है…..

30 साल का सुजॉय हमारे पास काउन्सलिंग के लिए लाया गया था – उसके पिता द्वारा. बाप-बेटे के बीच छत्तीस का आंकड़ा था. प्रथम दृष्टया सुजॉय हमें एक ढीला ढाला और मानसिक रूप से कमजोर इंसान लगा. ज़िन्दगी से बेज़ार. पर बातचीत करने पर शीघ्र ही ये स्पष्ट हो गया कि इस ढीले-ढाले शरीर के अंदर एक कुशाग्र बुद्धि मन है जो जीवन को भरपूर रूप से जी लेना चाहता है. बस मुश्किल ये थी कि सुजॉय ने खुद को एक खोल में बंद कर रखा था जो कि उसकी एक रक्षा-प्रणाली थी, उसके पिता के व्यवहार के प्रति.

काउंसलिंग के दौरान पता चला कि पिता-पुत्र के बीच बेहद खिंचाव था यहाँ तक कि अपनी मां के प्रति भी सुजॉय का रवईया बेरुख़ी से भरा था. सुजॉय के पिता एक self-made व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के बल बूते पर धन  व सामाजिक प्रतिष्ठा कमाई थी. सुजॉय के दादा के असामयिक निधन के समय, उसके पिता किशोर ही थे और एक सयुंक्त परिवार के सबसे बड़े बेटे होने के नाते उन्होंने परिवार की सारी जिम्मेदारियां शीघ्र ही अपने कन्धों पर ले लीं, लेकिन अपने परिवार के bread-winner व हीरो बने रहने की चाह में वो इतने व्यस्त व आत्ममुग्ध रहे कि उन्होंने बालक सुजॉय की शारीरिक कमजोरियों, जो की जन्म के बाद शीघ्र ही प्रकट होने लगी थीं, पर ध्यान नहीं दिया. सुजॉय ने चलना और बोलना दोनों ही देर से सीखा. उसकी मांसपेशियां शुरू से ही कमजोर थीं पर संयुक्त परिवार की भीड़ और अपनी व्यस्तता के कारण सुजॉय के पिता ने उसकी तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, किसकी सुजॉय को बेहद जरुरत थी. उन्होंने सुजॉय को परिवार के अन्य सामान्य बच्चों की भांति ही समझा. उन्होंने उसकी शारीरिक कमजोरियों पर ध्यान न दिया और उसकी कार्यक्षमता की तुलना परिवार के अन्य सामान्य बच्चों की साथ की जाती रही. उसकी हर असफलता पर उसको डांटा गया, नीचा दिखाया गया, यहाँ तक की उसको अक्सर बुरी तरह पीटा भी गया क्यूंकि वो अपने पिता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाता था. बचपन में ही पिता-पुत्र के बीच एक दरार पड़ गयी जो समय के साथ खायी का रूप लेती गयी. सुजॉय ने अपने आप को मानों एक खोल में बंद कर लिया – वो जिद्दी हो गया. उसने हर बात पर नां कहना शुरू कर दिया क्यूंकि उसकी हर छोटी-मोटी गलती पर उसको ये ही कहा गया कि, “तुम किसी काम के नहीं हो – तुम कुछ नहीं कर सकते”.

समय गुज़रता गया, सुजॉय बड़ा हुआ और अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाते हुए उसने अच्छे नम्बरों से M.B.A. भी कर लिया. पर उसका शरीर कमजोर ही रहा जिसके कारण उसको बहुत दिक्कतें आती रहीं. शरीर के बेडौल होने के कारण उसमें हीन भावना आने लगी और सामाजिक रूप से भी वो कटता गया. धीरे धीरे सुजॉय ने अपने पिता के व्यवसाय में भी हाथ बटाना शुरू कर दिया. पर यहाँ भी उसके पिता उसको बात बात पर झिड़कते रहे – यहाँ तक कि उनके कर्मचारियों के सामने भी, जो की सुजॉय को बेहद तकलीफ देता; उसका आत्मसम्मान और गिरने लगा.

दरअसल सुजॉय के पिता की तीव्र इच्छा थी की वो रातों-रात एक smart बॉय बन जाये. उन्होंने उसके लिए फिजियोथेरेपिस्ट भी रखा, जिम भी भेजा पर उनको रिजल्ट तुरंत चाहिए थे जो की मानसिक रूप से डिप्रेस्ड व मांसपेशियों की कमजोरी से जूझते सुजॉय के लिए संभव नहीं था. सुजॉय के पिता ये समझने में पूरी तरह से नाकामयाब रहे किशारिरिक कमजोरियों के बावजूद सुजॉय एक कुशाग्र बुद्धि बालक है बस अगर उसे पिता का प्यार मिल जाये तो वो ज़िन्दगी की सारी उड़ानें भरने में सक्षम है. सुजॉय की तीव्र इच्छा थी की उसके पिता उसकी कमजोरियों और ताकतों, दोनों को पहचानें व उसके सपोर्ट-पिलर बनें. बस पिता से प्यार के, प्रोत्साहन के दो बोल चाहिए थे. ऐसा नहीं था की सुजॉय के पिता उसे प्यार नहीं करते थे. उनके ह्रदय की गहराईयों में उनका मन सुजॉय के लिए अक्सर विकल हो उठता पर वो उन भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाए.

हमने सुजॉय के पिता को बताया की सुजॉय का वर्तमान व्यक्तिव उन्हीं के व्यवहार की देन है. जब उसे उनके प्यार की जरुरत थी वो कभी भी दे नहीं पाए. वो अभी भी अपनी गलती स्वीकार करने को तयार नहीं थे. काउन्सलिंग के दौरान उन्होंने अक्सर ये कहा की, “इस शहर का हर बड़ा आदमी मेरा दोस्त है”…पर अफ़सोस वो अपने बेटे को अपना दोस्त बनाने में नाकामयाब रहे. अपनी रक्षा के लिए बनाये गये भावनात्मक खोल से सुजॉय खुद भी बाहर आना चाहता है. वो अपना आत्मसम्मान पाना चाहता है.उसके पास अपने व्यवसाय को नयी ऊचाईयों पर ले जाने के प्लान हैं, बस जरुरत है तो पिता के प्यार और भरोसे की !!

क्या ऐसा होगा ?? हाँ अगर एक अक्खड़, दम्भी, पिता अपनी गलतियों को सुधारने को तैयार हो तो !! अपनी ईगो को छोड़ने को तयार हो तो !! बस जरुरत है उनको सुजॉय की योग्यताओं और उसके अंदर छिपी संभावनाओं को पहचानने की और सुजॉय को मजबूत भावनात्मक सहारा देने की !!

वर्ना संभावनाओं से भरी एक युवा ज़िन्दगी नष्ट हो सकती है !! एक युवा अपनी ज़िन्दगी को कहीं विराम न दे दे !!  और पीछे रह जाये एक दुखी पिता जो ये कभी समझ न पायेगा कि ये सब उसी का करा धरा है !! एक और परिवार दुःख और ग्लानी में डूब जायेगा.

कृपया अपने बच्चों का खयाल रखें. उनकी योग्यताओं और कमजोरियों को पहचानें. उनका तुलना दूसरों से न करें. अपनी इच्छाएं और असफलताएं उन पर न थोपें. उनको मजबूर न करें कि वो आपके अधूरे सपनों को पूरा करें. याद रखें हर व्यक्ति ईश्वर की एक विशिष्ट कृति है, उस जैसा दूसरा कोई नहीं. उसकी क्षमताओं को पहचान कर उसे आगे बढ़ने में सहायता करें, ताकि एक आत्मविश्वास से भरपूर इंसान बनाया जा सके. इन सबका एक ही परिणाम होगा – एक खुश और सफल व्यक्तित्व.

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